सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता
सफ़र में तुम नहीं हो तो सफ़र अच्छा नहीं लगता
सफ़र में तुम नहीं हो तो सफ़र अच्छा नहीं लगता
फिजा में रंग होली के हों या मंज़र दीवाली के
मगर जब तुम नहीं होते ये घर अच्छा नहीं लगता
मगर जब तुम नहीं होते ये घर अच्छा नहीं लगता
जहाँ बचपन की यादें हों कभी माँ से बिछड़ने की
भले ही ख़ूबसूरत हो शहर अच्छा नहीं लगता
भले ही ख़ूबसूरत हो शहर अच्छा नहीं लगता
परिन्दे जिसकी शाखों पर कभी नग्में नहीं गाते
हरापन चाहे जितना हो शज़र अच्छा नहीं लगता
हरापन चाहे जितना हो शज़र अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे हुस्न का ये रंग सादा ख़ूबसूरत है
हिना के रंग पर कोई कलर अच्छा नहीं लगता
हिना के रंग पर कोई कलर अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे हर हुनर के हो गए हम इस तरह कायल
हमें अपना भी अब कोई हुनर अच्छा नहीं लगता
हमें अपना भी अब कोई हुनर अच्छा नहीं लगता
निगाहें मुंतज़िर मेरी सभी रस्तों की है लेकिन
जिधर से तुम नहीं आते उधर अच्छा नहीं लगता
जिधर से तुम नहीं आते उधर अच्छा नहीं लगता
- जयकृष्ण तुषार
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