काश ! धरा मैं होती तू वो अम्बर होता
मिलते नहीं कभी तो क्या तू संग-संग हरदम होता
मिलते नहीं कभी तो क्या तू संग-संग हरदम होता
काश कि चकोर मैं होती तू वो चंदा होता
मैं हर पल तुझे ही देखती भले तू दूर ही होता
मैं हर पल तुझे ही देखती भले तू दूर ही होता
काश ! मैं पेड़ का पत्ता होती तू हवा का झोंका होता
कुछ वक़्त ही सही तेरे संग कुछ पल तो हमारा होता
कुछ वक़्त ही सही तेरे संग कुछ पल तो हमारा होता
काश !कि झरनों से मैं गिरती तू सागर का पानी होता
कुछ बूंद ही सही तुझसे मिलकर मन उत्साह से भर जाता
कुछ बूंद ही सही तुझसे मिलकर मन उत्साह से भर जाता
- प्रतिभा सिंह
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