Tuesday, 25 July 2017
Reliance Jio 4G feature phone फ्री में मिल रहा है-Get Reliance Jio 4G feature phone absolutely free
Hindi Suvichar in hindi language-सुविचार हिन्दी में-Hindi Suvichar-हिन्दी suvichar-सुविचार
Sunday, 16 July 2017
Question in IAS Interview-आईएएस इंटरव्यू में सवाल-IAS question in hindi-IAS इंटरव्यू की तैयारी
Monday, 3 July 2017
Saturday, 1 July 2017
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो- बशीर बद्र
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा- बशीर बद्र
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी- बशीर बद्र
सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी
छप्पर के चायख़ाने भी अब ऊंघने लगे
वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है- बशीर बद्र
वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है
उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला- बशीर बद्र
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला
घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा-बशीर बद्र
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे- बशीर बद्र
ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ज़िन्दगी तेरे आस पास रहे
चाँद इन बदलियों से निकलेगा
कोई न जान सका वो कहाँ से आया था- बशीर बद्र
कोई न जान सका वो कहाँ से आया था
और उसने धूप से बादल को क्यों मिलाया था
यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नही
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में- बशीर बद्र
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा- बशीर बद्र
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह- बशीर बद्र
आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह
जब कभी बादलों में घिरता है
ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में- बशीर बद्र
ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में
तुम छत पे नहीं आए, मैं घर से नहीं निकला
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया- बशीर बद्र
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया
कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है- बशीर बद्र
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है
ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर
नाम उसी का नाम सवेरे शाम लिखा- बशीर बद्र
नाम उसी का नाम सवेरे शाम लिखा
शे’र लिखा या ख़त उसको गुमनाम लिखा
उस दिन पहला फूल लिखा जब पतझड़ ने
किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना- बशीर बद्र
किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना
मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना
सियासत की अपनी अलग इक ज़बाँ है
सात रंगों के शामियाने हैं- बशीर बद्र
सात रंगों के शामियाने हैं
दिल के मौसम बड़े सुहाने हैं
कोई तदबीर भूलने की नहीं
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ- बशीर बद्र
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
मेरा उसूल है, पहले सलाम करता हूँ
मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है
याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम- बशीर बद्र
याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम
कुछ दिनों तक ख़ुदा रहे हैं हम
आरज़ूओं के सुर्ख़ फूलों से
परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता- बशीर बद्र
परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
न जी भर के देखा न कुछ बात की- बशीर बद्र
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ
दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ
घर के बाहर घर जैसा आराम कहाँ
बाज़ारों की चहल-पहल से रोशन है
होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते
पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है
सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है
बावज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है
मैं तिरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ
सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों
सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों
दिन का राजा रात की रानी हम दोनों
जगमग जगमग दुनिया का मेला झूठा
वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियाँ न हों
पलकों से आँसुओं की महक आनी चाहिए
आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया
आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं
रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं
हंसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़्मी हो जाते हैं
इस्टेसन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये
आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं
कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जाँ से हम निकल जाएँ
हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है
हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है
धुआँ बादल नहीं होता कि बादल दौड़ पड़ता है
भरोसा मत करो साँसों की डोरी टूट जाती है
भरोसा मत करो साँसों की डोरी टूट जाती है
छतें महफ़ूज़ रहती हैं हवेली टूट जाती है
मुहब्बत भी अजब शय है वो जब परदेस में रोये
मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना
मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना
चाँद रिश्ते में तो लगता नहीं मामा अपना
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है
तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है
ये शौक़ वो है जो ज़ेवर उतार लेता है
मैम आसमाँ की बुलन्दी पे बारहा पहुँचा
हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते
तुमसे नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन
इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती
इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती
आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती
इतना मोहताज न कर चश्म-ए-बसीरत मुझको
तितली ने गुल को चूम के दुल्हन बना दिया
तितली ने गुल को चूम के दुल्हन बना दिया
ऐ इश्क़ तूने सोने को कुन्दन बना दिया
तेरे ही अक्स को तेरा दुश्मन बना दिया
हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए
हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए
तलवार की नियाम कभी फेंकना नहीं
जिस्म का बरसों पुराना ये खँडर गिर जाएगा
जिस्म का बरसों पुराना ये खँडर गिर जाएगा
आँधियों का ज़ोर कहता है शजर गिर जाएगा
हम तवक़्क़ो से ज़ियादा सख़्त-जाँ साबित हुए
कभी थकन के असर का पता नहीं चलता
कभी थकन के असर का पता नहीं चलता
वो साथ हो तो सफ़र का पता नहीं चलता
वही हुआ कि मैं आँखों में उसकी डूब गया
बंद कर खेल-तमाशा हमें नींद आती है
बंद कर खेल-तमाशा हमें नींद आती है
अब तो सो जाने दे दुनिया हमें नींद आती है
डूबते चाँद-सितारों ने कहा है हमसे
उनसे मिलिए जो यहाँ फेर-बदल वाले हैं
उनसे मिलिए जो यहाँ फेर-बदल वाले हैं
हमसे मत बोलिए हम लोग ग़ज़ल वाले हैं
कैसे शफ़्फ़ाफ़ लिबासों में नज़र आते हैं
मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मैं लहजा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती
मैं इक दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था
न जाने कैसा मौसम हो दुशाला ले लिया जाये- मुनव्वर राना
न जाने कैसा मौसम हो दुशाला ले लिया जाये
उजाला मिल रहा है तो उजाला ले लिया जाये
चलो कुछ देर बैठें दोस्तों में ग़म जरूरी है
अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं- मुनव्वर राना
अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी- चादर उठाते हैं
तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते
आँखों में कोई ख़्वाब सुनहरा नहीं आता-मुनव्वर राना
आँखों में कोई ख़्वाब सुनहरा नहीं आता
इस झील पे अब कोई परिन्दा नहीं आता
हालात ने चेहरे की चमक छीन ली वरना
साथ अपने रौनक़ें शायद उठा ले जायेंगे- मुनव्वर राना
साथ अपने रौनक़ें शायद उठा ले जायेंगे
जब कभी कालेज से कुछ लड़के निकाले जायेंगे
हो सके तो दूसरी कोई जगह दे दीजिये
साथ अपने रौनक़ें शायद उठा ले जायेंगे
साथ अपने रौनक़ें शायद उठा ले जायेंगे
जब कभी कालेज से कुछ लड़के निकाले जायेंगे
हो सके तो दूसरी कोई जगह दे दीजिये
आँख का काजल तो चन्द आँसू बहा ले जायेंगे
कच्ची सड़कों पर लिपट कर बैलगाड़ी रो पड़ी
ग़ालिबन परदेस को कुछ गाँव वाले जायेंगे
हम तो एक अखबार से काटी हुई तसवीर हैं
जिसको काग़ज़ चुनने वाले कल उठा ले जायेंगे
हादसों की गर्द से ख़ुद को बचाने के लिये
माँ, हम अपने साथ बस तेरी दुआ ले जायेंगे
- मुनव्वर राना
गौतम की तरह घर से निकल कर नहीं जाते- मुनव्वर राना
गौतम की तरह घर से निकल कर नहीं जाते
हम रात में छुपकर कहीं बाहर नहीं जाते
बचपन में किसी बात पर हम रूठ गए थे
उसने लिक्खे थे जो ख़त कापियों में छोड़ आए- मुनव्वर राना
उसने लिक्खे थे जो ख़त कापियों में छोड़ आए
हम आज उसको बड़ी उलझनों में छोड़ आए
अगर हरीफ़ों में होता तो बच भी सकता था
मेरे कमरे में अँधेरा नहीं रहने देता- मुनव्वर राना
मेरे कमरे में अँधेरा नहीं रहने देता
आपका ग़म मुझे तन्हा नहीं रहने देता
वो तो ये कहिये कि शमशीरज़नी आती थी
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