Wednesday, 28 June 2017

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती
कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैं

बचपन में स्कूल की सुनहरी यादें....

बचपन में स्कूल की सुनहरी यादें.....
कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना
वो अपने बाल खुद न काढ पाना
पी टी शूज को चाक से चमकाना
वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...
वो बड़े नाखुनो को दांतों से चबाना
और लेट आने पे मैदान का चक्कर लगाना

खून के रिश्ते भी अक्सर अपना असर छोड़ देते हैं

खून के रिश्ते भी अक्सर अपना असर छोड़ देते हैं
शायद इसीलिए कुछ लोग अपना घर छोड़ देते हैं

हम कभी भी कोई बाजी हारते नहीं हैं दोस्तो

सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता

सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता
सफ़र में तुम नहीं हो तो सफ़र अच्छा नहीं लगता
फिजा में रंग होली के हों या मंज़र दीवाली के
मगर जब तुम नहीं होते ये घर अच्छा नहीं लगता

क्या जिरह ,क्या फैसले,जुर्म का इकबाल है

क्या जिरह ,क्या फैसले,जुर्म का इकबाल है
असल कातिल फिर बरी है,ये अजब सवाल है
वक़्त का क्या हिसाब दें ,फर्क पैमानों का है 

चांदनी रात में कुछ फीके सितारों की तरह

चांदनी रात में कुछ फीके सितारों की तरह
याद मेरी हैं वहां गुज़री बहारों की तरह
ज़ज्ब होती रही हर बूंद मेरी आँखों में 

तुम झोंपड़ी बनाओ यहाँ देख-भाल कर

तुम झोंपड़ी बनाओ यहाँ देख-भाल कर
गुज़रेंगे लोग आग की लपटें उछाल कर
संवेदना विहीन इस बस्ती में हर कोई