Wednesday, 28 June 2017
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज्ज़त वालों की इज्ज़त का हाल कभी
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उनकी गली में जाता हूँ तो क़दम मेरे रुक जाते हैं
उनकी गली में जाता हूँ तो क़दम मेरे रुक जाते हैं
देख के वो हँसते हैं मुझको पर्दे में छुप जाते हैं
उनका मुस्काना फूलों को इतना अच्छा लगता है
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नर्म रहकर न यहाँ बैठना-चलना होगा
नर्म रहकर न यहाँ बैठना-चलना होगा
वक्त को सख्त तरीको से बदलना होगा
प्यार की बात अन्धेरों में भटक सकती है
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हश्र औरों का समझ कर जो संभल जाते हैं
हश्र औरों का समझ कर जो संभल जाते हैं
वो ही तूफ़ानों से बचते हैं, निकल जाते हैं
मैं जो हँसती हूँ तो ये सोचने लगते हैं सभी
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सादगी की मिसाल हो तुम तो
सादगी की मिसाल हो तुम तो
ख़ुशबुओं के ख़याल हो तुम तो
दिल के दागों को कर दिया रोशन
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ख़ुशी कैसी भी हो, बस दो घड़ी महसूस होती है
ख़ुशी बेइंतहा जब भी कभी महसूस होती है
तुम्हें भी आँख में तब क्या नमी महसूस होती है
शोहरत, मिले दौलत, तमन्ना कोई पूरी हो
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जब पूछ लिया उनसे कि किस बात का डर है
जब पूछ लिया उनसे कि किस बात का डर है,
कहने लगे ऐसे ही सवालात का डर है
हर चीज़ में बिगड़े हुए अनुपात का डर है,
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