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निदा फ़ाजली
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Wednesday, 28 June 2017
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन, चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
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कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज्ज़त वालों की इज्ज़त का हाल कभी
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