Wednesday, 28 June 2017

मेरे ख़ुलूस की गहराई से नहीं मिलते

मेरे ख़ुलूस की गहराई से नहीं मिलते
ये झूठे लोग हैं सच्चाई से नहीं मिलते
वो सबसे मिलते हुए हमसे मिलने आता है 

हमने खुद ही खुद को छलना छोड़ दिया

हमने खुद ही खुद को छलना छोड़ दिया
सूरज बनकर रोज़ निकलना छोड़ दिया
नयी सदी के तौर तरीके क्या कहिये
बच्चों ने भी दोस्तों मचलना छोड़ दिया

रास्तों पर यकीन है, पहुँचाएंगे ज़रूर

रास्तों पर यकीन है, पहुँचाएंगे ज़रूर
ये हौसलों के पेड़ हैं लहराएँगे ज़रूर
ये लोग जो अकेले बेख़ौफ़ चल रहे हैं
कुछ तो नया जहाँ में कर जाएँगे ज़रूर

काश ! धरा मैं होती तू वो अम्बर होता

काश ! धरा मैं होती तू वो अम्बर होता
मिलते नहीं कभी तो क्या तू संग-संग हरदम होता
काश कि चकोर मैं होती तू वो चंदा होता
मैं हर पल तुझे ही देखती भले तू दूर ही होता

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन, चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे

आदमी ख़ुद से मिला हो तो गज़ल होती है

आदमी ख़ुद से मिला हो तो गज़ल होती है
ख़ुद से ही शिकवा-गिला हो तो गज़ल होती है
अपने जज्ब़ात को लफ्जों में पिरोने वालो

चन्द सिक्को की खुराफ़ात से क्या होना है

चन्द सिक्को की खुराफ़ात से क्या होना है?
आइए, सोच लें किस बात से क्या होना है?
पर फ़क़त बात से, ज़ज़्बात से क्या होना है?